शनिवार, 12 सितंबर 2026

छोटी सी प्रेम कहानी

 एक छोटी सी प्रेम कहानी जाने कब की खत्म हुई 

उसका पात्र बने अब तक जग में हम हैं घूम रहे।

बीते दिन महीने बीते बरस-बरस भर बीत गए 

लेकिन मन की स्मृतियों को नैनन से हम चूम रहे।

एक छोटी सी प्रेम ...

प्रणय काल के बीते दिन में जब तुम मन की रानी थी

अपने मन का मैं राजा था तुम मीरा सी दीवानी थी;

उन सपनों को जिन अपनों को अपना मैंने समझा था

छलिया जग से छल पाकर मस्ती में हम झूम रहे।

एक छोटी सी प्रेम कहानी...

एक पात्र, जो तुम भी थे उस छोटी प्रेम कहानी में 

खुशियों से अब चहक रहे हो वैभव की बागवानी में;

इस वैभव का उस फक्कड़़पन से कोई तोल नहीं 

जहां स्वर्ण मृग नाच रहे हों वहां प्रेम का मोल नहीं।

हम अपने बेगानेपन को अपनेपन में ढाल रहे

तेरे दामन में खुशियां हों और रिश्तों की धूम रहे।

एक छोटी सी प्रेम कहानी जाने कब की खत्म हुई 

उसका पात्र बने अब तक जग में हम हैं घूम रहे।

गुरुवार, 6 अगस्त 2026

मिसरा

 एक छोटी सी प्रेम कहानी जाने कब की खत्म हुई 

 उसका पात्र बने अब तक जग में हम हैं घूम रहे

भोजपुरी

 सूखल घाट, तलइया सूखल 

सूखल हमरी अंजुरी 

कि बदरी आवऽऽ हमरी नगरी 

कि गगरी रहिया ताके ना।

शनिवार, 25 जुलाई 2026

स्वांग

 स्वांग कान्हा का किया तो राधिका का त्रास होगा

प्रीत में जो छल किया तो कृष्ण का उपहास होगा।


असित नाथ तिवारी

शुक्रवार, 8 मई 2026

 एक दिन बहुत पछताओगे 

ढूंढोगे मुझे भीड़ में, नीड़ में 

बैठे कहीं एकांत में 

किसी कविता के तुकांत में 

खुद आगे करोगे हाथ 

पाने को थोड़ा साथ

पर कहीं नहीं पाओगे 

एक दिन बहुत पछताओगे

रविवार, 3 मई 2026

मिसरा

 फूल भीतर शूल भी हैं 

गुलाब संग बबूल भी हैं 

दिखते जो रिश्ते सरल

चुभते त्रिशूल भी हैं।

बुधवार, 22 अप्रैल 2026

नफरतों के भाप

 खूब तपाया खुद को उसने जिंदगी के ताप पर,

क्या बहस करेगा वो पुण्य और पाप पर।


पैंट पीछे से फटी तो शर्ट बाहर कर लिया,

मुफ़लिसी ढँकने में बेटा भी गया है बाप पर।


खूब सुशासन का वो ढोल पीटे जा रहे हैं,

स्विस में पैसा है जिनका तौल और नाप कर।


राष्ट्रवाद का नारा यूं ही नहीं निकलता ज़ोर से,

घर से निकलते हैं वो काजू-बादाम चांप कर।


सांप छप्पर पर हो लिपटा या कहीं हो खाट पर, 

दंश का ख़तरा रहेगा सिर्फ अपने आप पर।


धर्म का चोला है जिनके तन पर आज दमक रहा,

जश्न में डूबे हैं वो अपनों के ही संताप पर।


भूख का मसला तो कब का हुक्मरां ही खा गए,

अदहन उबल रहा है अभी नफरतों के भाप पर।

छोटी सी प्रेम कहानी

 एक छोटी सी प्रेम कहानी जाने कब की खत्म हुई  उसका पात्र बने अब तक जग में हम हैं घूम रहे। बीते दिन महीने बीते बरस-बरस भर बीत गए  लेकिन मन की ...