एक दिन बहुत पछताओगे
ढूंढोगे मुझे भीड़ में, नीड़ में
बैठे कहीं एकांत में
किसी कविता के तुकांत में
खुद आगे करोगे हाथ
पाने को थोड़ा साथ
पर कहीं नहीं पाओगे
एक दिन बहुत पछताओगे
असित नाथ तिवारी की कविताएं
खूब तपाया खुद को उसने जिंदगी के ताप पर,
क्या बहस करेगा वो पुण्य और पाप पर।
पैंट पीछे से फटी तो शर्ट बाहर कर लिया,
मुफ़लिसी ढँकने में बेटा भी गया है बाप पर।
खूब सुशासन का वो ढोल पीटे जा रहे हैं,
स्विस में पैसा है जिनका तौल और नाप कर।
राष्ट्रवाद का नारा यूं ही नहीं निकलता ज़ोर से,
घर से निकलते हैं वो काजू-बादाम चांप कर।
सांप छप्पर पर हो लिपटा या कहीं हो खाट पर,
दंश का ख़तरा रहेगा सिर्फ अपने आप पर।
धर्म का चोला है जिनके तन पर आज दमक रहा,
जश्न में डूबे हैं वो अपनों के ही संताप पर।
भूख का मसला तो कब का हुक्मरां ही खा गए,
अदहन उबल रहा है अभी नफरतों के भाप पर।
1. कंठ थे अवरुद्ध लोचन गा रहे थे
दो हृदय विपरीत पथ पर जा रहे थे
2. फूलों के गुलदस्ते में छिपी हुई कड़वाहट
खूब सुनाई पड़ रही नफरत की अब आहट,
कुछ रिश्ते ढोने पड़ते हैं मन पर बोझ लादे
कुछ रिश्तों के भाग लिखा है रहना सदा अभागे।
कितनी पीड़ा ढो पाऊं मैं
कितना नीर बहाऊं
तुमसे जब मैं कह नहीं पाया
किसको व्यथा सुनाऊं
जीवन कितना रीत गया
बीते कई बासंती मौसम
पतझड़ में सब बेरंग-बेरंग
अंग-अंग तेरे रंग ना लागा
ये फागुन भी बीत गया
जीवन कितना रीत गया।
झूठों के सारे झूठ भी नहले निकल गए
साहब हमारे दहलों के दहले निकल गए
फर्जी जो निकली डिग्री तो है शर्म की क्या बात
वादे भी तो सारे उनके जुमले निकल गए।
एक दिन बहुत पछताओगे ढूंढोगे मुझे भीड़ में, नीड़ में बैठे कहीं एकांत में किसी कविता के तुकांत में खुद आगे करोगे हाथ पाने को थोड़ा साथ प...