कितनी पीड़ा ढो पाऊं मैं
कितना नीर बहाऊं
तुमसे जब मैं कह नहीं पाया
किसको व्यथा सुनाऊं
असित नाथ तिवारी की कविताएं
कितनी पीड़ा ढो पाऊं मैं
कितना नीर बहाऊं
तुमसे जब मैं कह नहीं पाया
किसको व्यथा सुनाऊं
जीवन कितना रीत गया
बीते कई बासंती मौसम
पतझड़ में सब बेरंग-बेरंग
अंग-अंग तेरे रंग ना लागा
ये फागुन भी बीत गया
जीवन कितना रीत गया।
झूठों के सारे झूठ भी नहले निकल गए
साहब हमारे दहलों के दहले निकल गए
फर्जी जो निकली डिग्री तो है शर्म की क्या बात
वादे भी तो सारे उनके जुमले निकल गए।
कभी राम की आड़ में
कभी पाकिस्तान की आड़ में
वो चुनाव ही लड़ता है
मुसलमान की आड़ में;
कहता था कि दिखाएंगे
लाल आंखें चीन को
अब नैन मटक्का करने लगा
ट्रंप पहलवान की आड़ में।
आप कीजिए धर्म की रक्षा
वो छापेंगे नोट
वो बनेंगे राजा-मंत्री
आप डालिए वोट;
उनका बेटा बैठ हवाई जहाज
पढे़गा जा के लंदन
आपका बेटा बांध मुरेठा
फिरेगा गोपाल ठनठन।
सुना कि अब वो जाग गया है
पर मुंह नहीं है धोया
खुलते ही उसके मुंह से
निकले दुर्गंध का लोया
जगने-जगने की बात करे वो
जो मन में राखे खोट
वो बनेगा राजा-मंत्री
आप डालिए वोट।
चल साधो उस गांव जहां अब भी अंधेरा है
उस आंगन में जिसको अब भी भूख ने घेरा है
सूरज रोज़ निकलता होता रोज उजाला है
लेकिन इस घर का दिन भी होता काला है।
काली अंधियारी छाई है
आंगन का चूल्हा उदास है
पेट धंसा, हड्डी दिखती है
और उदासी का जहां रहता डेरा है
चल साधो उस गांव जहां अब भी अंधेरा है।
चल साधो कि वहां तुम्हें चलना ही होगा
देख सही तो क्या उसने अब तक है भोगा
चल साधो कि खोज छुपा कहां सवेरा है
चल साधो उस गांव जहां अब भी अंधेरा है।
बाभन, बनिया, दलित, मुसलमां
सिख, इसाई, बौद्ध, जैनिया
है कौन यहां काले दुख ने
जिसको न घेरा है
चल साधो उस गांव जहां अब भी अंधेरा है।
कि तुझको चलता देख भरोसा
तुझसे ही सबको है आशा
तेरी आंखों में ही सपनों का बसेरा है
चल साधो उस गांव जहां अब भी अंधेरा है
अब भी अंधेरा है।
वो जो किसी दिन तुम्हें चुभा होगा
देखना गौर से वो टूटा होगा
बिखर जाने का लिए मलाल वो
भरी महफ़िल में भी तन्हा होगा।
कितनी पीड़ा ढो पाऊं मैं कितना नीर बहाऊं तुमसे जब मैं कह नहीं पाया किसको व्यथा सुनाऊं