खूब तपाया खुद को उसने जिंदगी के ताप पर,
क्या बहस करेगा वो पुण्य और पाप पर।
पैंट पीछे से फटी तो शर्ट बाहर कर लिया,
मुफ़लिसी ढँकने में बेटा भी गया है बाप पर।
खूब सुशासन का वो ढोल पीटे जा रहे हैं,
स्विस में पैसा है जिनका तौल और नाप कर।
राष्ट्रवाद का नारा यूं ही नहीं निकलता ज़ोर से,
घर से निकलते हैं वो काजू-बादाम चांप कर।
सांप छप्पर पर हो लिपटा या कहीं हो खाट पर,
दंश का ख़तरा रहेगा सिर्फ अपने आप पर।
धर्म का चोला है जिनके तन पर आज दमक रहा,
जश्न में डूबे हैं वो अपनों के ही संताप पर।
भूख का मसला तो कब का हुक्मरां ही खा गए,
अदहन उबल रहा है अभी नफरतों के भाप पर।
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