जीवन कितना रीत गया
बीते कई बासंती मौसम
पतझड़ में सब बेरंग-बेरंग
अंग-अंग तेरे रंग ना लागा
ये फागुन भी बीत गया
जीवन कितना रीत गया।
1. कंठ थे अवरुद्ध लोचन गा रहे थे दो हृदय विपरीत पथ पर जा रहे थे 2. फूलों के गुलदस्ते में छिपी हुई कड़वाहट खूब सुनाई पड़ रही नफरत की अब आह...
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