कितनी पीड़ा ढो पाऊं मैं
कितना नीर बहाऊं
तुमसे जब मैं कह नहीं पाया
किसको व्यथा सुनाऊं
कितनी पीड़ा ढो पाऊं मैं
कितना नीर बहाऊं
तुमसे जब मैं कह नहीं पाया
किसको व्यथा सुनाऊं
जीवन कितना रीत गया
बीते कई बासंती मौसम
पतझड़ में सब बेरंग-बेरंग
अंग-अंग तेरे रंग ना लागा
ये फागुन भी बीत गया
जीवन कितना रीत गया।
एक दिन बहुत पछताओगे ढूंढोगे मुझे भीड़ में, नीड़ में बैठे कहीं एकांत में किसी कविता के तुकांत में खुद आगे करोगे हाथ पाने को थोड़ा साथ प...