बुधवार, 22 अप्रैल 2026

नफरतों के भाप

 खूब तपाया खुद को उसने जिंदगी के ताप पर,

क्या बहस करेगा वो पुण्य और पाप पर।


पैंट पीछे से फटी तो शर्ट बाहर कर लिया,

मुफ़लिसी ढँकने में बेटा भी गया है बाप पर।


खूब सुशासन का वो ढोल पीटे जा रहे हैं,

स्विस में पैसा है जिनका तौल और नाप कर।


राष्ट्रवाद का नारा यूं ही नहीं निकलता ज़ोर से,

घर से निकलते हैं वो काजू-बादाम चांप कर।


सांप छप्पर पर हो लिपटा या कहीं हो खाट पर, 

दंश का ख़तरा रहेगा सिर्फ अपने आप पर।


धर्म का चोला है जिनके तन पर आज दमक रहा,

जश्न में डूबे हैं वो अपनों के ही संताप पर।


भूख का मसला तो कब का हुक्मरां ही खा गए,

अदहन उबल रहा है अभी नफरतों के भाप पर।

सोमवार, 13 अप्रैल 2026

मिसरा

 1. कंठ थे अवरुद्ध लोचन गा रहे थे 

दो हृदय विपरीत पथ पर जा रहे थे


2. फूलों के गुलदस्ते में छिपी हुई कड़वाहट 

खूब सुनाई पड़ रही नफरत की अब आहट,

कुछ रिश्ते ढोने पड़ते हैं मन पर बोझ लादे

कुछ रिश्तों के भाग लिखा है रहना सदा अभागे।

 एक दिन बहुत पछताओगे  ढूंढोगे मुझे भीड़ में, नीड़ में  बैठे कहीं एकांत में  किसी कविता के तुकांत में  खुद आगे करोगे हाथ  पाने को थोड़ा साथ प...