रविवार, 16 मई 2021

कांधे पर शव

अखबारों ने रंग-पोत कर जिसको सुविधाएं बतलाईं 

रात-दिन टीवी ने जिसके अच्छे दिन की गाल बजाई 

गांव-गांव और शहर-शहर में दहक रही हैं वही चिताएं

नए भारत का यही हाल है, क्या-क्या तुमको और बताएं


माओं की चित्कारों से बहरा हुआ समय अभी है

बूढ़े बापू के कंधे पर बेटों की लाशें औंधी हैं

तर्पण और विसर्जन से अब घाटों का दम घुटता है

घंट इतने भारी हो गए कि पीपल का तन झुकता है

चील और कौए नोच रहे हैं, मानव का ये हाल दिखाएं

नए भारत का यही हाल है, क्या-क्या तुमको और बताएं


सांस नहीं है यहां अभी तो तड़प-तड़प तन मरता है

गंगा की धाराओं पर लावारिस ही बहता है

उठती लहरों पर उतराते, धाराओं में गिरते हैं

कुत्ते और सियार नोचते, गिद्ध अघाए फिरते हैं

गंगा की आंखों से तुमको चलो शवों का हाल दिखाएं

नए भारत का यही हाल है, क्या-क्या तुमको और बताएं


उंखड़ रही हैं सांसें देखो, जड़ समाज मरता जाता

चुप्पी जब घनघोर होती, सिस्टम यूं ही सड़ता जाता

ढोते-ढोते लाशों को अब तो चीखो, हुंकार करो

जो सिस्टम हत्यारा है उस पर अब प्रहार करो

या यूं ही अपने बेटों के शव कांधे पर ढोओगे

या यूं ही बच्चों की लाशों पर घुट-घुट कर रोओगे

या यूं ही माओं की रोज आधी चिता सजाओगे

या यूं ही खुद किसी दिन तड़प-तड़प मर जाओगे


समय परीक्षा ले रहा है आओ अपना फर्ज निभाएं

भारत मारा बिलख रही है आओ उसको चुप कराएं

मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

मिसरा

 कुछ पलाश हैं, कुछ महुआ है, कुछ बबूल हैं

अपने-अपने जीवन के अपने उसूल हैं

प्रेम रिक्त हृदय में ज्वाला कुंठा की

प्रेम सिक्त हृदय में टेसू के फूल हैं।


...असित नाथ तिवारी...

बुधवार, 10 मार्च 2021

राम के गद्दार

 अच्छा ये बताओ

राम को कितना तुम जानते हो

चुनाव दर चुनाव राम को आजमाते हो

मंचों से राम के नारे लहराते हो

रैलियों में रामनामा फहराते हो

तो फिर क्यों सबरी के लिए अब बेर भी मुहाल है

एक तरफ तुम्हारे पूंजीपति मित्र हैं

दूसरी तरफ सबरी बेहाल है

इसीलिए तो पूछ रहा हूं

कि, राम को कितना तुम जानते हो

 

जनता के सवाल तो राजा के लिए अग्निपरीक्षा होते हैं

और राजधर्म तो देवी सीता की अग्निपरीक्षा लेता है

और तुम, तुम्हारे लिए तो सवाल गद्दारी की बुनियाद है

सवाल पूछने वाला बाबर और तैमूर की औलाद है

तुम तो सवालों को गद्दारी के खांचे में डालते हो

इसीलिए तो पूछ रहा हूं कि राम को तुम कितना जानते हो

राम के लिए तो किसान धरती का प्यारा पुत्र है

धरती पर देवताओं का एक सर्वसुलभ सूत्र है

तुम्हारे लिए वो खालिस्तानी है, पाकिस्तानी है

अराजक है आतंकवाद की निशानी है

राम तो त्याग की प्रतिमूर्ति हैं

वो करते हैं राज का त्याग

पिता की इच्छा के लिए जाते हैं दुरूह जंगल

तुमको तो हर हाल में चाहिए राजसत्ता

पिता को धकिया के उनको पहुंचाते हो मार्गदर्शक मंडल

तुम तो हृदय में घृणा पालते हो

इसीलिए तो पूछ रहा हूं कि राम को तुम कितना जानते हो

 

राम की अयोध्या में सब ईश्वर का निर्माण है

यमुना के घाटों पर अभेद का प्रमाण है

तुम्हारे लिए तो ईश्वर की कृतियों में भेद ही भेद है

कोई स्पर्श के लायक नहीं, कोई कटुआ है, कोई म्लेच्छ है

तुम तो भगवान की रचना को ही आंतरिक खतरा बताते हो

इसीलिए तो पूछ रहा हूं कि राम को कितना तुम जानते हो।

सच तो ये है कि तुम कायर हो, मक्कार हो

सही मायनों में तुम राम के गद्दार हो

 

सोमवार, 4 जनवरी 2021

रोज जलते रहे, रोज़ मचलते रहे

जब से बिछड़े हो हमसे, भरोसा हुआ

लौट आओगे एक दिन जलाकर दिया

एक उम्मीद है, एक आस बंधी

हम न होंगे जुदा एक आस लगी

तेरी यादों की राहों पर चलते रहे-2

रोज़ उभरते रहे, रोज़ ढलते रहे-2

 

अपनी दहलीज पर एक दीया जला

अपनी तकती निगाहों को दे हौसला

खून आंसू बने और जिगर धो गए

आंखें रहती हैं नम और जुगनू खो गए

बिछुड़न की ये ज्वाला धधकती रही

अपनी ही अगन में हम जलते रहे

रोज़ उभरते रहे, रोज़ ढलते रहे-2

 

जब भी होली, दिवाली मनी हर जगह

आई ईद सजी जब गली हर जगह

मेरी आंखों में डूबी सी यादें रहीं

तेरी यादों की रिमझिम बरसातें रहीं

हम दहकते रहे, हम मचलते रहे

रोज़ उभरते रहे, रोज़ ढलते रहे-2

हम दहकते रहे, हम मचलते रहे।

...असित नाथ तिवारी...

  05-01-21

रविवार, 3 जनवरी 2021

गिद्ध है तू

 लाशें देख इतराने वाले

नोंच-नोंच कर खाने वाले


नीच-पतित सिद्ध है तू

हां, गिद्ध है तू।


नोटबंदी का नाग फुंफकारा

जन-जन का तू है हत्यारा


हत्यारों के कुनबे में प्रसिद्ध है तू

हां, गिद्ध है तू।


सड़कों पर मजदूर मर गए

सैंकड़ों घर से दूर मर गए

बेबस भारत चीख रहा था

तू थाली-ताली पीट रहा था


नरभक्षी पूर्णतः अशुद्ध है तू

हां, गिद्ध है तू


दहलीज पर तेरे जवान मरे हैं

धरती मां की संतान मरे हैं

पेट सबका पालने वाले

भारत के किसान मरे हैं

धनपशुओं के तलवे चाट

मोर के संग तेरा अट्टहास


   भारत भाग्य विधाता के विरुद्ध है तू

हां, गिद्ध है तू।


... असित नाथ तिवारी...

शनिवार, 25 जुलाई 2020

दिल-ए-बीमार

दिल-ए-बीमार कभी दवाख़ानों में नहीं जाते
जख्मी दिल लेके शफाखानों में नहीं जाते
जाने को तो वो हर जगह चले जाएं मगर
मरहम मिल जाए उन ठिकानों पर नहीं जाते

उसने देखा नहीं इश्क में ये मंजर होना
सूनी आंखों में लहू का समंदर होना
मेरी बरबादी का वो जश्न चाहे खूब करें-2
हमें आता है लुट कर भी कलंदर होना

मेरे आंसू मेरी पलकों पे ठहर जाते हैं
हम वो शय हैं जो गिर कर भी संभल जाते हैं
बड़े नादान हैं मेरे ग़म पे मुस्कुराने वाले-2
हम वो शय हैं जो हर दर्द आजमाते हैं

अंतहीन इंतजार हो तुम

हर बार टूटना, हर बार बिखरना
फिर लहरों में मिलते जाना
फिर टकराना, फिर मिट जाना
तटों का कंठहार हो तुम
कोई कहानी नहीं जो खत्म जाओगे
मेरे लिए अंतहीन इंतजार हो तुम

जैसे देखा है न पपीहे को
बारिश की पहली बूंद का इंतजार करते हुए
कांटा-कांटा, पत्ती-पत्ती कलियों का सफर
फूलों का वही निखार हो तुम
कोई कहानी नहीं जो खत्म जाओगे
मेरे लिए अंतहीन इंतजार हो तुम

जैसे सदियों तक जमा होता है
पहाड़ के गर्भ में बारिश का पानी
फिर रिसता है, बहता है, तोड़ता है, फोड़ता है,
लड़ता है चट्टानों से बड़ी जंग
फिर फूटती है कहीं नदी की एक धार
कल-कल उफनाती, इतराती वही नदी,वही मझधार हो तुम
कोई कहानी नहीं जो खत्म जाओगे
मेरे लिए अंतहीन इंतजार हो तुम

देखी है तुमने भी फूटते कोपलों की मुस्कान
सुना है मैंने भी चिड़ियों का मधुर तान
शाम को उम्मीदों को समेटे डूबता है जो सूरज
सबेरे वही सूरज उम्मीदों को बिखरेता है क्षितिज के पार
डूबना-उगना, क्षितिज पर उम्मीदों का पसर जाना
उम्मीदों के क्षितिज का विस्तार हो तुम
कोई कहानी नहीं जो खत्म जाओगे
मेरे लिए अंतहीन इंतजार हो तुम
मेरे लिए अंतहीन इंतजार हो तुम

छोटी सी प्रेम कहानी

 एक छोटी सी प्रेम कहानी जाने कब की खत्म हुई  उसका पात्र बने अब तक जग में हम हैं घूम रहे। बीते दिन महीने बीते बरस-बरस भर बीत गए  लेकिन मन की ...