सोमवार, 26 नवंबर 2018

माहताब

आंख खुली, खिड़की खुली माहताब देख लिया
सुबह-सुबह मैंने अजीम खिताब देख लिया
अब क्या ज़िक्र करूं किसी लैला, किसी शीरी, किसी हीर का मैं
एक भोली सी सूरत में सबका जवाब देख लिया

शुक्रवार, 23 नवंबर 2018

प्रेम और स्वार्थ

आंसुओं से पत्थर नम हुआ नहीं करते
इश्क़ करने वाले कभी बद्दुआ नहीं करते
जहां प्रेम हो वहां गलतफहमियां आ नहीं सकतीं
जहां स्वार्थ हो वहां प्रेम हुआ नहीं करते

बुधवार, 14 नवंबर 2018

मोहब्बत की रवायत


तेरी आंखों में रहना है
तेरे दिल में धड़कना है
अपना पथ खुद ही रचना है
प्रचलित गतियों से बचना है

मोहब्बत की रवायत अब तलक
दुनिया ने मानी है
गर ये आग का दरिया है
तो जलना है, संवरना है


रविवार, 14 अक्टूबर 2018

मिसरा


इन आंखों में दरिया सा एक ख्वाब उतरा है
फिर इस झील में देखो एक चांद उतरा है
बिछड़े इश्क की इन्हीं नाउम्मीद राहों में
कहीं शीरीं उतरी है कहीं फरहाद उतरा है

शनिवार, 13 अक्टूबर 2018

दंश लावण्या

जैसे मां का पेट फाड़ कर निकलता है शिशु ऑक्टोपस
ठीक वैसे ही विस्मृतियों का पेट फाड़कर निकलती हैं तुम्हारी यादें
चट्टानों को तोड़कर निकलती धाराओं की तरह
पसरती हैं स्मृतियां क्षण-क्षण और कण-कण में
जैसे कठफोड़वा खोखला करता जाता है दरख्त को
ठीक वैसे ही रोज खोखला होता है मेरा अस्तित्व

जब दीमक चाट रहे होते हैं मेरे होने के भ्रम को
और खोखला कर रहे होते हैं खुद को भूल जाने वाले श्रम को
जब उम्मीदों को रौशन करता रोज उगता है सूरज
और शाम को तमाम उम्मीदों को समेट डूब जाता है सूरज
या फिर भोर का शुकवा तारा, इनमें कोई भी नहीं तोड़ पाता है
मन के एक छोर पर धक्कमपेल कर रहीं स्मृतियों के क्रम को

फिर चाय की चुस्की हो या अखबार की खुश्की
नीम की कड़वाहट हो या महुआ की मिठास
कहीं दूर भागना चाहता हूं लावण्या के हर अंश से
और हर कदम गिर जाता हूं उसी लावण्या के दंश से

नोट: लावण्या को आम तौर पर ब्रह्मी कहते हैं। इसका उपयोग स्मृति शक्ति बढ़ाने के लिए किया जाता है



सोमवार, 17 सितंबर 2018

बग़ावत होनी चाहिए


जब जुल्म हो तो बग़ावत होनी चाहिए
इंसान की हैवान से अदावत होनी चाहिए
राख में तब्दील हों राजाओं के अहंकार
हर ग़रीब-मजदूर की ये चाहत होनी चाहिए

ज़मीन हमारी, मिल तुम्हारा
संसाधन हमारे, विकास तुम्हारा
इस पूंजीवादी कब्जे की मुखालिफत होनी चाहिए
जब जुल्म हो तो बग़ावत होनी चाहिए
इंसान की हैवान से अदावत होनी चाहिए


ज़हर में तब्दील जो कर रहे हैं दरिया को
मौत में तब्दील जो कर रहे हैं हवा को
जंगलों में बो रहे हैं इस्पात के कारखाने और
खेतों से उगल रहे हैं बारूद के गोले जो
पूंजी के इन भेड़ियों की हजामत होनी चाहिए
जब जुल्म हो तो बग़ावत होनी चाहिए
इंसान की हैवान से अदावत होनी चाहिए


गर जिंदगी में है भरोसा युद्ध का ऐलान कर
हक की हर बात पर बग़ावत होनी चाहिए
जब जुल्म हो तो बग़ावत होनी चाहिए
इंसान की हैवान से अदावत होनी चाहिए




रविवार, 12 अगस्त 2018

कहानी अमर सपूतों की



भारत के वीर सपूतों की...
मैं अमर कहानी कहता हूं...
सन 1947 की...
वो बात पुरानी कहता हूं...
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लाशों पर लाशें पटती थीं...
खून की नदियां बहती थीं...
फिर भी दीवानों की टोली...
वन्दे मातरम कहती थी...
हर मन में बस एक जज्बा था...
सर कट जाए तो कट जाए...
पर भारत माता का अपनी...
सम्मान नहीं जाने पाए...
इस आजादी को लाने में..
इस झण्डे को फहराने में...
कुर्बान जवानी कहता हूं...
भारत के वीर सपूतों की...
मैं अमर कहानी कहता हूं...
सन 1947 की...
वो बात पुरानी कहता हूं...
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न धर्म कोई न जात कोई...
सब एक ही हिन्दुस्तानी थे...
गोरों के खट्टे दांत किए...
ऐसे तेवर तूफानी थे,...
शहर-शहर भारत के पूत
फांसी का फंदा झूल गए...
भारत की माटी चूम-चूम
सौ कष्टों को भूल गए
मैं उनकी वीर शहादत की...
उस वतन परस्त मोहब्बत की...
जाबांज जवानी कहता हूं...
भारत के वीर सपूतों की...
मैं अमर कहानी कहता हूं...
सन 1947 की...
वो बात पुरानी कहता हूं...
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मंदिर मस्जिद में भेद न हो...
गिरजा घर में गुरुद्वारा हो...
भगवान करे इस आंगन का...
अब न फिर  बंटवारा हो...
गीता के छंदों सा निर्मल...
बाइबिल और कुरान पढ़े...
संस्कृति जहां पर करुणा हो...
एक ऐसा हिन्दुस्तान बने...
सबके अपने-अपने मत हैं...
जो नहीं जरुरी सहमत हों...
मैं मन की बात कहता है..
मैं सबकी बात कहता हूं....
भारत के वीर सपूतों की...
मैं अमर कहानी कहता हूं...
सन 1947 की...
वो बात पुरानी कहता हूं...
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अब बहुत उठ चुकीं बंदूकें...
अब वार नहीं करने देंगे...
भाई-भाई के बीच छिपा...
अब प्यार नहीं मरने देंगे...
अब सरहद की सीमाओं पर...
मानवता का पाठ पढ़ाएंगे..
अब खून नहीं हम पानी से...
फूलों का बाग लगाएंगे...
मैं रंग प्रेम का भर दूंगा...
फिर धरती मां का कर दूंगा...
मैं आंचल धानी कहता हूं...
भारत के वीर सपूतों की...
मैं अमर कहानी कहता हूं...
सन 1947 की...
वो बात पुरानी कहता हूं...
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फिर यही तिरंगा विश्व शांति का,...
दूत बना फहराएगा...
जब तक ये धरा सुशोभित है
झण्डा यूं ही लहराएगा...
आजादी के दीवानों की बातें...
जब-जब की जाएंगी
कर याद शहादत वीरों की...
हर आंखें नम हो जाएंगी...
हर बरस लगे उन मेलों की...
तीर-ओ-तलवार के खेलों की...
अंतिम निशानी कहता हूं...
भारत के वीर सपूतों की...
मैं अमर कहानी कहता हूं...
सन 1947 की...
वो बात पुरानी कहता हूं...

छोटी सी प्रेम कहानी

 एक छोटी सी प्रेम कहानी जाने कब की खत्म हुई  उसका पात्र बने अब तक जग में हम हैं घूम रहे। बीते दिन महीने बीते बरस-बरस भर बीत गए  लेकिन मन की ...