बुधवार, 20 नवंबर 2019

एक लमहा...


माना आज जुगनुओं के शहर में जश्न का ही किस्सा है
माना आज तितलियों के बहर में रंगीनियों का हिस्सा है
माना आज कलियों के ऊपर भंवरों का गुंजन गान होगा
माना आज तटों से टकराती लहरों का मधुरिम तान होगा
पर ये आज बस शाम होते ही मिट जाएगा
फिर अकेले में कभी मेरा चेहरा याद आएगा
एक लम्हा फिर तुम्हें ग़मज़दा कर जाएगा-2

मौसमों की रेजगारी वसंत लेकर आएगी
हर चमन में भंवरे होंगे, कली-कली मुस्काएगी
फिर कहीं कोयल विरह के राग गुनगुनाएगी
और कोयल के सुरों में नाम मेरा आएगा
सुन के मेरा नाम मौसम ग़मज़दा हो जाएगा
एक लम्हा फिर तुम्हें ग़मज़दा कर जाएगा-2

आंख तेरी जब कभी रौशनी से चौंधियाएगी
और मेरी पलकों से कुछ ढुलक सी जाएगी
और क़तरा-क़तरा खूं के दिल में उतर जाएंगे
एक पल को ही सही वो वक्त याद आएगा
बीते कल से जब तुम्हारा आज टकराएगा
एक लम्हा फिर तुम्हें ग़मजदा कर जाएगा-2

मंगलवार, 29 अक्टूबर 2019

पलकों पर आंसू

दिल-ए-बीमार कभी दवाख़ानों में नहीं जाते
जख्मी दिल लेके शफाखानों में नहीं जाते
जाने को तो वो हर जगह चले जाएं मगर
मरहम मिल जाए उन ठिकानों पर नहीं जाते

उसने देखा नहीं इश्क में ये मंजर होना
सूनी आंखों में लहू का समंदर होना
मेरी बरबादी का वो जश्न चाहे खूब करें-2
हमें आता है लुट कर भी कलंदर होना

मेरे आंसू मेरी पलकों पे ठहर जाते हैं
हम वो शय हैं जो गिर कर भी संभल जाते हैं
बड़े नादान हैं मेरे ग़म पे मुस्कुराने वाले-2
हम वो शय हैं जो हर दर्द आजमाते हैं

बुधवार, 9 अक्टूबर 2019

पथ के पत्थर


मेरी आंखों से कभी ये जो छलक आते हैं
भरी महफिल में भी ये तनहा भटक जाते हैं
वो क्या जानें कि कतरा भर की है क्या क़ीमत
ये वो मोती हैं जो गिरके बिखर जाते हैं-2
मेरी आंखों से कभी ये जो छलक आते हैं

उनका दिल भी कभी धड़केगा मेरी खातिर
उनका दिल भी कभी धड़केगा मेरी खातिर
वो जो ठुकरा के हमको रोज़ निखर जाते हैं-2

हम वो पत्थर हैं जो राहों में पड़े रहते हैं
ठोकरों को सहें और खामोश अड़े रहते हैं
सिसकियां दिल की जो सुन ले हम वो पत्थर हैं
राह-ए-मोहब्बत में हम बस यूं ही खड़े रहते हैं

हमने खाई हैं ठोकरें ज़माने भर की
घूरती रहतीं हैं निगाहें भी ज़माने भर की
वो जो बस एक बार बढ़ के हमें थाम लेते
बदल जातीं यूं हीं राहें ज़माने भर की

उसने चाहा ही नहीं हालात बदलते कैसे
ये आंसू फिर किसी दामन में पिघलते कैसे
जिनकी खातिर हम चराग बने बैठे हैं
रौशनी उनको नामंजूर, हम जलते कैसे  

मेरी आंखों से कभी ये जो छलक आते हैं
भरी महफिल में भी ये तनहा भटक जाते हैं
वो क्या जानें कि कतरा भर की है क्या क़ीमत
ये वो मोती हैं जो गिरके बिखर जाते हैं-2
मेरी आंखों से कभी ये जो छलक आते हैं

शुक्रवार, 27 सितंबर 2019

मौन पीड़ा

वृंदावन की इन्हीं गलियों में
एक द्वारिका हम गढ़ लेते
मेरे इन भावों को तुम
कभी समझ भी पाए क्या ?
मैं तो कान्हा बन जाता
तुम राधा बन पाए क्या ?

मेरी पलकों से जब कल-कल
यमुना की जलधार बही
और हृदय के अंतसपुर से
पीड़ा की रक्तधार बही
तूने मेरे उर के छाले कभी सहलाए क्या ?
मैं तो कान्हा बन जाता
तुम राधा बन पाए क्या ?

मैं तो समरक्षेत्र में था
रण जारी था मक्कारों से
तन-मन दोनों आहत थे
लांछन के कटु प्रहारों से
पीड़ा ने जब-जब तड़पाया
तुमने दर्द कभी सहलाए क्या ?
मैं तो कान्हा बन जाता
तुम राधा बन पाए क्या ?

प्रेम ही यमुना से संगम है
प्रेम की गंगा है अति पावन
मेरे इन भावों को तुम
कभी समझ भी पाए क्या ?
मैं तो कान्हा बन जाता
तुम राधा बन पाए क्या ?

गुरुवार, 19 सितंबर 2019

कौन बेवफा


एक मुद्दत से जिनपर भरोसा किया
वो भरोसा मेरा हादसा हो गया
बात उनकी करूं या मैं खुद की करूं
वफा किसने की, कौन बेवफा हो गया
एक मुद्दत से जिनपर भरोसा किया

वो समझते रहे इक तिजारत इसे
देखते-देखते क्या से क्या हो गया
अब तो इक दिन जला दूंगा इस दिल को मैं
इतना बेबस मेरा ये सिला हो गया
एक मुद्दत से जिनपर भरोसा किया
वो भरोसा मेरा हादसा हो गया

अबकी टूटा तो फिर ना मैं जुड़ पाऊंगा
देखो, कैसा अजब माजरा हो गया
रह न जाएगा दिल पर भरोसा मेरा
कुछ इस कदर वाकया हो गया
एक मुद्दत से जिनपर भरोसा किया
वो भरोसा मेरा हादसा हो गया
बात उनकी करूं या मैं खुद की करूं
वफा किसने की, कौन बेवफा हो गया









शुक्रवार, 13 सितंबर 2019

मिसरा


तेरी आंखों में चमकूं ऐसे कि माहताब हो जाऊं
हर्फ-हर्फ जुगनू चमकें, मैं वो किताब हो जाऊं
ऐ चांद, रोज़ उतरा कर तू यूं ही छत पर
मैं किनारों पर डूब जाऊं, शब-ए-आफताब हो जाऊं

बुधवार, 11 सितंबर 2019

रोक लो मुझको

बंध गया सामान मेरा
अब जाने को तैयार
रोक लो मुझको, अगर है प्यार

मैं यहीं हर रोज़ हूं नज़रें बिछाता
हर सुबह उम्मीद की किरणें जगाता
पर ढले जैसे यहां यह दिन बेचारा
आस सारे यही सूरज है डूबाता
हंसता मुझ पर ये संसार
रोक लो मुझको अगर है प्यार

ये समय तो बीतता ही जाएगा
कुछ तो है जो टीसता ही जाएगा
बाग़ के ये फूल भी चुभने लगेंगे
हंस, मृग और कोयल भी सुनने लगेंगे
विरह की ये वेदना अपार
रोक लो मुझको अगर है प्यार

कल को कोई गीत ना सुनाएगा
प्रेम के दो छंद ना फिर गाएगा
गंगा की लहरें भी उनसे रूठेंगी
और यमुना तट भी आंख दिखाएगा
प्रेम का ये छंद ना हो बेकार
रोक लो मुझको अगर है प्यार

बंध गया सामान मेरा
अब जाने को तैयार
रोक लो मुझको, अगर है प्यार















छोटी सी प्रेम कहानी

 एक छोटी सी प्रेम कहानी जाने कब की खत्म हुई  उसका पात्र बने अब तक जग में हम हैं घूम रहे। बीते दिन महीने बीते बरस-बरस भर बीत गए  लेकिन मन की ...