रविवार, 14 जनवरी 2018

अब भरम रह गए

तुम न तुम रह गए,  हम न हम रह गए
अब तो रिश्तों के खाली भरम रह गए
साथ चलकर भी मंजिल वो पा न सके
जिनके पीछे सफर में कदम रह गए
न खुशी रह गई, न गम रह गए
तुम न दुश्मन बने, न सनम रह गए....
तुम न तुम रह गए, हम न हम रह गए
अब तो रिश्तों के खाली भरम रह गए
अब तो एहसासों के बस कफन रह गए
मोहब्बत में कैसे कहें क्या मिला
चंद यादों के दिल में जख्म रह गए
तुम न तुम रह गए, हम न हम रह गए
अब तो रिश्तों के खाली भरम रह गए.

वो भी बाबर तुम भी बाबर

बाबर ने तुड़वा दिया मंदिर
तुड़वा दी सीता रसोई भी
तुड़वा दी करोड़ों लोगों की अस्था
तुड़वा दिया राजा के न्याय का भ्रम भी
जब टूटा होगा मंदिर तब फैली होगी दहशत
करोड़ों लोगों की आंखों में फैली होगी वहशत
तब हुआ होगा एहसास रियाया होने का
तब राजा की ताक़त के सामने
जनता की लाचारी, बेबसी साबित हुई होगी
और फिर राजा होने के दंभ से
जब चुनी गई होगी मस्जिद की दीवार
तब और बड़ी हुई होगी दहशत
तब और पसर गई होगी वहशत
ठीक वैसे ही जैसे पसरी 6 दिसंबर 1992 को
ठीक वैसे ही जब भीड़ की ताक़त ने
गिरा दी थी मस्जिद बहुसंख्यक होने के एहसास के साथ
और बताई गई अल्पसंख्यक को उसकी औकात
उसकी डरी आंखों में देखे गए अपनी जीत के आंसू
आबादी में उसके कम होने को समझा गया उसकी कमज़ोरी
ठीक वैसे जैसे बाबर ने ढहाया होगा मंदिर
वैसे ही तो गिराई थी मस्जिद भी
तो फिर बाबर को ग़लत बताने वाले
उतने ही ग़लत हैं जितना बाबर रहा होगा
तो फिर बताइए आप बाबर से अलग कहां हैं
बाबर लुटेरा था तो लुटेरा हैं आप भी
बाबर आक्रांता था तो आक्रांता हैं आप भी
बाबर आतातायी था तो आतातायी हैं आप भी

प्रेम बीज भर है

बीते इन सालों में
तुमने मुझे थोड़ा-थोड़ा भुलाया होगा
फिर भी कहीं किसी कोने में
मैं थोड़ा सा बचा रहा होऊंगा
मन के सिमटते अलापों में
उस थोड़े से मुझ को तुमने गुनगुनाया होगा
मेरे आदि को, मेरे अंत को
मेरी यादों के अनंत को कहीं बचाया होगा, कहीं छुपाया होगा
ये जो प्रेम है न वो बीज है
थोड़ी नमी पाकर ही अंकुरित होता है
बीते उन सालों में जो मुझे भुलाने में गुजरे होंगे
तुमने हर मोड़ पर मुझे पाया होगा
बस ये मत पूछना कि बीते उन्हीं सालों को
मैने कैसे बिताया होगा

हत्यारे के आंसू

हम जिस समय में जी रहे हैं
उस समय में हत्यारा हत्याओं पर आंसू बहा रहा है
हत्यारों का समूह तालियां पीट रहा है
मुट्ठियां लहरा रहा है, बांहें फड़फड़ा रहा है
हम पर थोप रहा है वो सारे इल्ज़ाम
हमारे बीच के ही किसी शख्स की हत्या करके
वो हमें ही ठहराना चाहता है हत्या का जिम्मेदार
हम खून से लथपथ हैं और वो नारे लगा रहा है
हम डर नहीं रहे हैं तो फिर वो किसी और का कत्ल कर रहा है
ये मरना हमें मंजूर है लेकिन उससे डरना मंजूर नहीं है
डरने और जीने के बीच बिना डरे मौत अच्छी है
दाभोलकर, पनसारे से पहले भगत सिंह, आज़ाद और गांधी
उनसे पहले सुकरात और ईशा मरे, वो भी बिना डरे
तब भी खूब हुईं थीं डराने की कोशिशें
तब भी हत्यारा हत्याओं पर आंसू बहा रहा था
अब भी हत्यारा हत्याओं पर आंसू बहा रहा है
हत्यारों का समूह तलियां बजा रहा है

इस दौर में

इस दौर का सवाल है
बिजली, पानी, रोजगार कहां हैं ?
जवाबदेहों का जवाब है
औरंगजेब अत्याचारी था
हम पूछ रहे हैं 
स्कूल, कॉलेजों में पढ़ाने वालों की कमी क्यों ?
वो बता रहे हैं
बाबर आक्रांता था
वो गूंजते सवालों को टाल रहे हैं
हम टलते सवालों को उठा रहे हैं
उनके टालने का अंदाज
हमारे सवालों को धारदार बना रहा है

मक्कार हरिश्चंद्र

जो व्यापमं के घपलेबाज हैं हरिश्चंद्र हैं
देखो चावल घोटाले वाले हरिश्चंद्र हैं
पनामा के टैक्स चोर सब हरिश्चंद्र हैं
चोर-चोर, घपलेबाज सब हरिश्चंद्र हैं
राष्ट्रवाद के ठेकेदार हैं, हरिश्चंद्र हैं
बीसों फर्जी फर्म वाले हरिश्चंद्र हैं
फर्जी डिग्रीधारी सारे हरिश्चंद्र हैं
झूठे और मक्कार आज के हरिश्चंद्र हैं
धर्म ठेकेदार आज के हरिश्चंद्र हैं

इजाजत मांगती है

मोहब्बत फिर इजाजत चाहती है
रवायत से बग़ावत चाहती है
मेरा दिल जो तेरे पहलू में है
उस दिल की हिफाजत चाहती है
हज़ारों ख्वाहिशों को बज्म में पैबंद कर लूंगा
हज़ारों चाहतें अपनी नजरबंद कर लूंगा
तेरी आंखों के समंदर में खुदकुशी कर लूं
ऐसी ही कोई रवायत चाहती है
मोहब्बत फिर इजाजत चाहती है

छोटी सी प्रेम कहानी

 एक छोटी सी प्रेम कहानी जाने कब की खत्म हुई  उसका पात्र बने अब तक जग में हम हैं घूम रहे। बीते दिन महीने बीते बरस-बरस भर बीत गए  लेकिन मन की ...