मंगलवार, 4 जून 2019

मिसरे

दिल की बातों से बेख़बर होगी
आंसुओं से ना तर-ब-तर होगी
उसको चाहिए अभी बड़ा ओहदा
उसको मोहब्बत की ना कदर होगी

वो जो हंसते हैं मेरे ग़म पे अभी
खुदा करे कि वो ना रोएं कभी
उनके हिस्से के ग़म भी मेरे हों
इश्क में उनका दिल दुखे ना कभी

धड़कनों को संभाल लूंगा मैं
ग़म को सांसों में ढाल लूंगा मैं
उसको दुनिया में नाम करना है
खुद को नग़मों में डाल दूंगा मैं

बुधवार, 8 मई 2019

इंतज़ार

1.
मुझे अब भी इंतज़ार रहता है
बस कहता नहीं हूं मैं
क़तरा-क़तरा समंदर चाहत का बन गया
पलकों में क़ैद रहता हूं
बस बहता नहीं हूं मैं।

2.
उसका चेहरा सच की किताब लगता है
आसमां के सीने पर सूरज इनकलाब लगता है
ऐ समंदर तेरे सीने में जो हर रात चमकता है
मेरी आंखों में वो माहताब लगता है
मेरे सीने में सुराख जिसने की, वही खंजर
उसके हाथों में जश्न-ए-खिताब लगता है

रविवार, 5 मई 2019

कुछ शेर

उसके-मेरे दरमियां ये फासला होना ही था
जो अपना था ही नहीं वो जुदा होना ही था
दिल को संभालो, रोको, काबू में रखो साहब
ऐसी मोहब्बत का यही सिला होना ही था


इस दौर में एहसास की बात मत कीजिए
आपने क्या-क्या किया ये याद मत कीजिए
रोकिए खुद को टूटने से, बिखरने से, मिट जाने से
किसी के लिए भी खुद को बर्बाद मत कीजिए


शाख से टूटने से पहले बेजान होना पड़ता है
हवाएं कांधा देती हैं फिर खाक होना पड़ता है
अब शिकायत उनसे भला करें भी तो क्या करें
कब्र ही तो है दिल भी, जख्मों को दफ्न होना पड़ता है


मेरे टूटने से, बिखरने से, मिट जाने से
चैन तुझे मिलता है तो मिल जाने दे
मेरा वजूद तुझमें मिलकर खत्म होना था
क्या बुरा कि जुदाई की आग में जल जाने दे


उनकी आंखों में अजीब से शोले थे
मैं जल रहा था, मेरे दिल में फफोले थे
उनको जब तक ग़रज थी आंखों में पानी रखा
वो यूं बदल गए, हम कितने भोले थे


इससे पहले कि दिल के हाथों मजबूर हो जाऊं
बेहतर होगा कि मैं तुमसे दूर हो जाऊं
या फिर टूट के बिखर जाऊं शाख से पत्तों की तरह
या फिर टूटे हुए शीशे सा चकनाचूर हो जाऊं
दूर से ही देखा करूं तेरी हर परवाज को मैं
जो ना देख सकूं तो जिंदगी को नामंजूर हो जाऊं


गुरुवार, 2 मई 2019

दो आंखें शिद्दत वाली

हर खुली खिड़की में झांको
तो भी चांद नहीं दिखता
बस एक खिड़की खुलते ही
पूरा चांद वहीं दिखता

घर-घर, छत-छत गली-गली में
कोई आता-जाता है
बस एक छत है जिस पर अक्सर
चांद उतर कर आता है

मन में बसी एक मूरत हो तो
कोई सूरत क्या कर ले
जब छत पर चांद उतर आए तो
आसमान भी क्या कर ले

लेकिन चांद का इतराना ये
तब तक ही कायम रहता है
कोई शिद्दत से छत पर
हर रोज निहारा करता है

दो आंखें शिद्दत वाली जब
बिछुड़न के आंसू रोती हैं
फिर कोई छत ना रौशन होती
फिर कोई चांद नहीं रहता

हर खुली खिड़की में झांको
तो भी चांद नहीं दिखता
बस एक खिड़की खुलते ही
पूरा चांद वहीं दिखता

बुधवार, 17 अप्रैल 2019

चट्टान पिघलाना है


ओ फूलों पर मंडराने वाले भौंरों
ओ कलियों का रंग चुराने वालों
ओ दीपक पर दहते प्रेम पतिंगों
ओ आंखों से मय छलकाने वालों
ओ बागों के सुख में खोए रसिकों
भ्रमरों का जीवन राग सुनाने वालों
रूपजाल के मोहक वृत में खोकर
ओ तारों के छंद छेड़ने वालों
लैला-मजनूं के किस्सों को दुहराकर
ओ चंदा को रोज़ छलने वालों
ये कोमल सा प्यार तुम्हारे हिस्से
अपने हिस्से तो चट्टानी किस्से
अब मुझको तो प्यार आजमाना है
चट्टान खड़ा है जिसे अब पिघलाना है




सोमवार, 15 अप्रैल 2019

ऐ रूठने वाले


मेरी चाहत, मोहब्बत की हिफाजत करना
ऐ रूठने वाले तू इतनी तो गैरत रखना
जिस तरह मेरी आंखों में तैरतीं यादें
कुछ इस तरह तुम भी तो चाहत रखना

वो कहते हैं हमसे रूठ कर जाने वाले
मेरी आदत में नहीं है मोहब्बत करना
वो जो समझे थे मोहब्बत को खोना-पाना
हम समझते रहे मोहब्बत है इबादत करना
मेरी चाहत, मोहब्बत की हिफाजत करना
ऐ रूठने वाले तू इतनी तो गैरत रखना

तूने पूछा नहीं जागती रातों का सबब
तूने देखा ही नहीं आंखों का समंदर होना
तूने ढूंढा ही नहीं जिगर का बहता झरना
मेरी चाहत, मोहब्बत की हिफाजत करना
ऐ रूठने वाले तू इतनी तो गैरत रखना

है वजूद जब तक मोहब्बत दिलों में जिंदा है
वो देखो जहां नफरत है वो किस तरह शर्मिंदा है
जिस दिन जाऊं मैं छोड़ कर ये तेरी दुनिया
मेरी मय्यत से ना तुम अदावत करना
मेरी चाहत, मोहब्बत की हिफाजत करना
ऐ रूठने वाले तू इतनी तो गैरत रखना ।

गुरुवार, 11 अप्रैल 2019

जहां युद्ध है वहां प्रेम है


तुम दीपशिखा सी शांत भाव में लीन
मैं लपटों पर नाग सा फन लहराता
तुम अधरों पर गंगा जल की धारा
मैं चट्टानों पर ज्वाला धधकाता
तुम विधि से सम्मत एक शालीन सी काया
मैं विधि विरुद्ध हर एक विधि अपनाता
ये विभेद प्रकृति का परम नियम है
जहां दिवस है वहीं खड़ा भी तम है।

तुम उपवन में एक कली मुस्काती
मैं कंटक की राह रोज़ अपनाता
तुम उपवन में उड़ती तितली सी हो
मैं वन-वन घूम धूप-घाम अपनाता
तुम चांद सी शीतलता हो बरसाती
मैं अंगारों पर ही रहा राह बनाता
ये विभेद प्रकृति का परम नियम है
ऊपर से जो कठोर अंदर से वही नरम है।

जो सूरज का ताप नहीं सह पाता
वही चांदनी का सुख नहीं ले पाता
जो दुर्गम पथ से हार मान लेता है
वो फिर हारे को हरिनाम होता है
कठिन राह का पथिक हलाहल पीता
जो लड़ा समर में वही हारा या जीता
अग्नि में जो तपता कनक सदृश है
वही जग के कपाल पर शोभित है
ये विभेद प्रकृति का परम नियम है
जहां अग्नि है वहीं तेज पवन है 

छोटी सी प्रेम कहानी

 एक छोटी सी प्रेम कहानी जाने कब की खत्म हुई  उसका पात्र बने अब तक जग में हम हैं घूम रहे। बीते दिन महीने बीते बरस-बरस भर बीत गए  लेकिन मन की ...