शनिवार, 13 अक्टूबर 2018

दंश लावण्या

जैसे मां का पेट फाड़ कर निकलता है शिशु ऑक्टोपस
ठीक वैसे ही विस्मृतियों का पेट फाड़कर निकलती हैं तुम्हारी यादें
चट्टानों को तोड़कर निकलती धाराओं की तरह
पसरती हैं स्मृतियां क्षण-क्षण और कण-कण में
जैसे कठफोड़वा खोखला करता जाता है दरख्त को
ठीक वैसे ही रोज खोखला होता है मेरा अस्तित्व

जब दीमक चाट रहे होते हैं मेरे होने के भ्रम को
और खोखला कर रहे होते हैं खुद को भूल जाने वाले श्रम को
जब उम्मीदों को रौशन करता रोज उगता है सूरज
और शाम को तमाम उम्मीदों को समेट डूब जाता है सूरज
या फिर भोर का शुकवा तारा, इनमें कोई भी नहीं तोड़ पाता है
मन के एक छोर पर धक्कमपेल कर रहीं स्मृतियों के क्रम को

फिर चाय की चुस्की हो या अखबार की खुश्की
नीम की कड़वाहट हो या महुआ की मिठास
कहीं दूर भागना चाहता हूं लावण्या के हर अंश से
और हर कदम गिर जाता हूं उसी लावण्या के दंश से

नोट: लावण्या को आम तौर पर ब्रह्मी कहते हैं। इसका उपयोग स्मृति शक्ति बढ़ाने के लिए किया जाता है



सोमवार, 17 सितंबर 2018

बग़ावत होनी चाहिए


जब जुल्म हो तो बग़ावत होनी चाहिए
इंसान की हैवान से अदावत होनी चाहिए
राख में तब्दील हों राजाओं के अहंकार
हर ग़रीब-मजदूर की ये चाहत होनी चाहिए

ज़मीन हमारी, मिल तुम्हारा
संसाधन हमारे, विकास तुम्हारा
इस पूंजीवादी कब्जे की मुखालिफत होनी चाहिए
जब जुल्म हो तो बग़ावत होनी चाहिए
इंसान की हैवान से अदावत होनी चाहिए


ज़हर में तब्दील जो कर रहे हैं दरिया को
मौत में तब्दील जो कर रहे हैं हवा को
जंगलों में बो रहे हैं इस्पात के कारखाने और
खेतों से उगल रहे हैं बारूद के गोले जो
पूंजी के इन भेड़ियों की हजामत होनी चाहिए
जब जुल्म हो तो बग़ावत होनी चाहिए
इंसान की हैवान से अदावत होनी चाहिए


गर जिंदगी में है भरोसा युद्ध का ऐलान कर
हक की हर बात पर बग़ावत होनी चाहिए
जब जुल्म हो तो बग़ावत होनी चाहिए
इंसान की हैवान से अदावत होनी चाहिए




रविवार, 12 अगस्त 2018

कहानी अमर सपूतों की



भारत के वीर सपूतों की...
मैं अमर कहानी कहता हूं...
सन 1947 की...
वो बात पुरानी कहता हूं...
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लाशों पर लाशें पटती थीं...
खून की नदियां बहती थीं...
फिर भी दीवानों की टोली...
वन्दे मातरम कहती थी...
हर मन में बस एक जज्बा था...
सर कट जाए तो कट जाए...
पर भारत माता का अपनी...
सम्मान नहीं जाने पाए...
इस आजादी को लाने में..
इस झण्डे को फहराने में...
कुर्बान जवानी कहता हूं...
भारत के वीर सपूतों की...
मैं अमर कहानी कहता हूं...
सन 1947 की...
वो बात पुरानी कहता हूं...
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न धर्म कोई न जात कोई...
सब एक ही हिन्दुस्तानी थे...
गोरों के खट्टे दांत किए...
ऐसे तेवर तूफानी थे,...
शहर-शहर भारत के पूत
फांसी का फंदा झूल गए...
भारत की माटी चूम-चूम
सौ कष्टों को भूल गए
मैं उनकी वीर शहादत की...
उस वतन परस्त मोहब्बत की...
जाबांज जवानी कहता हूं...
भारत के वीर सपूतों की...
मैं अमर कहानी कहता हूं...
सन 1947 की...
वो बात पुरानी कहता हूं...
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मंदिर मस्जिद में भेद न हो...
गिरजा घर में गुरुद्वारा हो...
भगवान करे इस आंगन का...
अब न फिर  बंटवारा हो...
गीता के छंदों सा निर्मल...
बाइबिल और कुरान पढ़े...
संस्कृति जहां पर करुणा हो...
एक ऐसा हिन्दुस्तान बने...
सबके अपने-अपने मत हैं...
जो नहीं जरुरी सहमत हों...
मैं मन की बात कहता है..
मैं सबकी बात कहता हूं....
भारत के वीर सपूतों की...
मैं अमर कहानी कहता हूं...
सन 1947 की...
वो बात पुरानी कहता हूं...
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अब बहुत उठ चुकीं बंदूकें...
अब वार नहीं करने देंगे...
भाई-भाई के बीच छिपा...
अब प्यार नहीं मरने देंगे...
अब सरहद की सीमाओं पर...
मानवता का पाठ पढ़ाएंगे..
अब खून नहीं हम पानी से...
फूलों का बाग लगाएंगे...
मैं रंग प्रेम का भर दूंगा...
फिर धरती मां का कर दूंगा...
मैं आंचल धानी कहता हूं...
भारत के वीर सपूतों की...
मैं अमर कहानी कहता हूं...
सन 1947 की...
वो बात पुरानी कहता हूं...
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फिर यही तिरंगा विश्व शांति का,...
दूत बना फहराएगा...
जब तक ये धरा सुशोभित है
झण्डा यूं ही लहराएगा...
आजादी के दीवानों की बातें...
जब-जब की जाएंगी
कर याद शहादत वीरों की...
हर आंखें नम हो जाएंगी...
हर बरस लगे उन मेलों की...
तीर-ओ-तलवार के खेलों की...
अंतिम निशानी कहता हूं...
भारत के वीर सपूतों की...
मैं अमर कहानी कहता हूं...
सन 1947 की...
वो बात पुरानी कहता हूं...

तिरंगा पूछ रहा है

कहो महात्मा
लालकिले से लगा पूछने राष्ट्रध्वज यह
कहो महात्मा, भारत वर्ष कैसा लगता है ?
कहो महात्मा, भारत वर्ष कैसा लगता है ?


ग्राम सुराज के सपने अब पूरे हो गए
या किसान अब भी कहीं भूखा मरता है
गली-गली में गीत गा रही सोने की चिड़िया
या कि गरीब अब भी पेट से लड़ता है
कहो महात्मा, अब बुंदेलखंड कैसा लगता है

कहो महात्मा
फूट डालो और राज करो, फिरंगी थे तब
या अब भी वही फिरंगी राज करते हैं
दो सौ वर्षों तक जिनसे लड़ा राष्ट्र ये
क्या अब वो लोग नहीं सत्ता गहते हैं ?

कहो महात्मा
दंगों के खून से रंगी ज़मी कैसी लगती है
कहो महात्मा
घोटालों की लंबी लड़ी कैसी लगती है

आजादी की जंग, यही कहकर तुमने
की थी औरों के समान ही भागीदारी
सत्य-अहिंसा को अपना हथियार बनाया
ये हथियार पड़े थे तब सब पर भारी
क्या सत्य सबल दिखता तुमको अब भारत भर में
या फिर झूठ-फरेब की है अब सरदारी

कहो महात्मा
क्या अहिंसा भारत पहचान बची है
या कि खून से सनी है धरती हमारी
गली-गली में चीख रहीं हैं लुटी बेटियां
चौराहों पर भीख मांग रहीं अब माएं
कहो महात्मा, निर्मल हो गई क्या गंगा अब
या सन 47 से ज्यादा गंदाजल बहता है

कहो महात्मा
सत्य सारथी, और अहिंसा के रक्षक तुम
तुमसे बेहतर कौन जानता मर्म हमारा
राष्ट्रवाद ही राष्ट्र का अगर कलंक बन जाए
तो फिर राषट्रवाद ठुकराना धर्म हमारा
धर्म अगर लोकतंत्र पर हमला कर दे
तो अधर्म पथ ही है धर्म हमारा

कहो महात्मा
लड़ते-लड़ते क्या भारत अब
आजादी का पर्व मना पाएगा यूं ही
अपनों के ही खून सने हाथों से
क्या राष्ट्रध्वज लहरा पाएगा यूं ही

कहो महात्मा
क्या आजादी है सबको भारत भर में
या भीड़तंत्र का राज, तुम्हें कैसा लगता है
कहो महात्मा
लालकिले से लगा पूछने राष्ट्रध्वज यह...
कहो महात्मा..



गुरुवार, 21 जून 2018

कर शीर्षासन


                      कर शीर्षासन
रोजगार की ऐसी-तैसी
अर्थतंत्र की डूबी भैंसी
चार साल का तेरा शासन
भ्रष्टाचार में हुआ नंबर वन
कर शीर्षासन !
सीमा पर हर रोज मरे हैं
देश के भीतर रोज लड़े हैं
डूबी है शिक्षा की नैया
अस्पताल बीमार पड़े हैं
कहां गए सब तेरे भाषण ?
कर शीर्षासन !
कारोबार की ऐसी-तैसी
बंद हो रहे धंधे देसी
रोज-रोज के दंगे-दंगे
गाय-गोबर, लाठी-झंडे
मुद्दों पर न होगा आसन
कर शीर्षासन !
कहां गए रोज़गार के वादे ?
कहां गए वो पक्के इरादे ?
दस सिरा वाला वो जुमला
काले धन के जुमले-झांसे
पंद्रह लखिया फरेब वो
कुछ तो दे दो इस पर भाषण
कर शीर्षासन !
दिए थे झांसे मंचों से जो
फेंके थे सब मंचों से जो
बिहार, झारखंड, असम औ केरल
यूपी, कश्मीर, महाराष्ट्र, मिजोरम
गोवा, सिक्किम और हिमाचल
बना रहे थे सबको नंबर वन
कर शीर्षासन !
पूरी दुनिया घूम रहे हो
सूट-बूट को चूम रहे हो
धेला एक न लाए अब तक
झूठ-फरेब का परचून बने हो
जब जनता-मांगे रोटी-राशन
कर शीर्षासन !


मंगलवार, 1 मई 2018

मिसरा

मेरे चाहने वालों मुझे एक काम करने दो
बहुत थक गया हूं मैं, थोड़ा आराम करने दो
मेरी आवाज़ से डरता है वो, शहंशाह-ए-मुल्क
अब मेरी खामोशियों से उसे कुछ देर डरने दो

शनिवार, 28 अप्रैल 2018

कौन था सबसे पहला प्यार

याद है तुमको पहला-पहला प्यार
बोलो मेरे यार
अंगुली पकड़ के दादी ने जब कदम चलाए पहली बार
और कंधे पर ले दादाजी जब लगे दिखाने ये संसार
बोलो कौन था सबसे पहला प्यार
गोद उठाए चली थी दीदी, भईया ने थामे थे हाथ
चाचा लेकर टॉफी पहुंचे, बुआ खिलाए कर मनुहार
बोलो कौन था सबसे पहला प्यार
पेट पर चढ़ के मां के कूदे, पापा बने घोड़ा सवार
मामा-मामी की पुचकार या नाना-नानी की दुलार
बोलो कौन था सबसे पहला प्यार
छोटी हथेली में शक्कर भर ली और चुराए थे अचार
चाची ने जब कलफ डाल डालकर पहना दिए कुर्ता-सलवार
बोलो कौन था सबसे पहला प्यार
कान खींच दिए कुतिया के, गली में खेले बिल्ली के संग
गइया के बछड़े संग खेला, तितली पकड़ी रंग-बिरंग
ताखे में गौरैया बोली, कोयल कूक करे पुकार
बोलो कौन था सबसे पहला प्यार
गिल्ली-डंडा खेले जिन संग, छुपम-छुपाई के सब यार
पहली कक्षा के साथी सब या दसवीं के राजकुमार
इंटर वाली गोरी सुंदरी या बीए वाली सायकिल सवार
बोलो कौन था सबसे पहला प्यार
रिश्तेदारी वाला गबरु या पड़ोस का पढ़ाकू कुमार
घर आता-जाता कोई या दूर का कोई राज़दार
बोलो कौन था सबसे पहला प्यार
दफ्तर मे जिसकी खातिर पहुंचे
मेले में था इंतजार
मॉल-मार्केट साथ घूमे थे,मूवी देखी थी कई बार
या फिर जो हर मुश्किल में था साथ
साथ रहा दुख-दर्द में जो
बोलो कौन था सबसे पहला प्यार

छोटी सी प्रेम कहानी

 एक छोटी सी प्रेम कहानी जाने कब की खत्म हुई  उसका पात्र बने अब तक जग में हम हैं घूम रहे। बीते दिन महीने बीते बरस-बरस भर बीत गए  लेकिन मन की ...