रविवार, 14 जनवरी 2018

होरी की होली

होरी हारा पेट से, हल्कू खाली पेट
फाग तो है गांव में, फागुन खेते खेत
फाग-फाग हो गांव में जिनके घर में माल
सूखे-पिचके गाल पर का कर लिहें गुलाल
माल पूए की महक है दूर किसी के आंगन
होरी को आंगन नहीं, ना कहुं जात है मांगन
हल्कू की धोती में पड़ गई फिर नई है गांठ
जिनके घर हो मालपूआ वो मनाए फाग
हल्कू-होरी के लिए रंग लगे अब आग
खाली जेब वालों के लिए होली है दुख राग

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किसको व्यथा सुनाऊं

 कितनी पीड़ा ढो पाऊं मैं  कितना नीर बहाऊं  तुमसे जब मैं कह नहीं पाया  किसको व्यथा सुनाऊं